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पद्मश्री डॉ. पुरु दाधीच
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पद्मश्री डॉ. पुरु दाधीच को मिला 'अकादमी रत्न', राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने किया सम्मानित

पद्मश्री डॉ. पुरु दाधीच (Dr. Puru Dadheech)

कथक के दिग्गज पद्मश्री डॉ. पुरु दाधीच को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू द्वारा 'संगीत नाटक अकादमी फेलोशिप' से सम्मानित किया गया।

इंदौर2024-25

कथक के प्रख्यात कलाकार, गुरु और विद्वान पद्मश्री डॉ. पुरु दाधीच को भारतीय कला जगत के सर्वोच्च सम्मान 'संगीत नाटक अकादमी फेलोशिप' से सम्मानित किया गया है। राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मू ने उन्हें यह प्रतिष्ठित सम्मान प्रदान किया।

कथक के दिग्गज कलाकार, गुरु और विद्वान पद्मश्री डॉ. पुरु दाधीच को भारतीय कला जगत के सर्वोच्च सम्मानों में से एक 'संगीत नाटक अकादमी फेलोशिप', जिसे 'अकादमी रत्न' भी कहा जाता है, से सम्मानित किया गया है। राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मू ने उन्हें यह प्रतिष्ठित सम्मान प्रदान किया। डॉ. दाधीच को कथक और प्रदर्शन कलाओं के क्षेत्र में उनके लंबे और उल्लेखनीय योगदान के लिए इस सम्मान के लिए चुना गया है। यह अकादमी का सर्वोच्च सम्मान है, जिसके तहत एक समय में अधिकतम 40 जीवित कलाकार ही फेलो हो सकते हैं। मार्च 2026 में अकादमी की सामान्य परिषद ने डॉ. पुरु दाधीच सहित सात प्रतिष्ठित कलाकारों को 2024-25 के लिए अकादमी फेलो चुना था। डॉ. पुरु दाधीच का जन्म 17 जुलाई 1939 को मध्यप्रदेश के उज्जैन में हुआ था। उन्होंने जयपुर घराने के कथक की शिक्षा पंडित दुर्गा प्रसाद, पंडित नारायण प्रसाद और पंडित सुंदर प्रसाद जैसे महान गुरुओं से ली। उन्होंने नाट्यशास्त्र और साहित्य का भी गहन अध्ययन किया। उनकी पहचान केवल एक मंचीय कलाकार के रूप में नहीं, बल्कि कथक के शिक्षक, शोधकर्ता, लेखक और कोरियोग्राफर के रूप में भी बनी। वे कथक को औपचारिक शिक्षा व्यवस्था की मुख्यधारा में लाने वाले प्रमुख विद्वानों में माने जाते हैं और कथक में 'संगीताचार्य' की उपाधि प्राप्त करने वाले पहले विद्वान रहे हैं। डॉ. दाधीच को वर्ष 2020 में भारत सरकार द्वारा पद्मश्री से सम्मानित किया गया था। उन्हें 2018 का संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, मध्यप्रदेश सरकार का शिखर सम्मान, ध्रुपद भूषण और कई अन्य प्रतिष्ठित सम्मान भी मिल चुके हैं। अब 'अकादमी रत्न' मिलने के साथ डॉ. दाधीच के सम्मान की सूची में देश के सबसे प्रतिष्ठित कला सम्मानों में से एक और जुड़ गया है। कथक के मंच से लेकर उसकी शास्त्रीय परंपरा, शिक्षा और शोध तक उनके दशकों के योगदान को इस सम्मान के जरिए राष्ट्रीय स्तर पर एक नई पहचान मिली है। उन्होंने 1961 में उज्जैन के माधव संगीत महाविद्यालय में कथक का प्रशिक्षण देना शुरू किया और इसके बाद देश के कई प्रतिष्ठित संस्थानों में अध्यापन और शोध का कार्य किया। वे लखनऊ के भातखंडे हिंदुस्तानी संगीत महाविद्यालय में प्रोफेसर एवं नृत्य विभागाध्यक्ष रहे और बाद में इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय, खैरागढ़ में डीन के रूप में भी अपनी सेवाएं दीं। उनके मार्गदर्शन में कई शोधार्थियों ने कथक पर पीएचडी की है। इंदौर में उन्होंने डॉ. विभा दाधीच के साथ मिलकर 1988 में नटवरी कथक नृत्य अकादमी की स्थापना की, जहाँ अब तक 3,000 से अधिक विद्यार्थियों को कथक का प्रशिक्षण दिया जा चुका है।
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